अमूर्त मुख भाजपा: दिल्ली चुनाव 2013

अमूर्त मुख भाजपा

दिल्ली चुनाव 2013

Arvind_Modi

पाँच राज्यों के चुनाव हुए। नतीजे आए। उनकी घोषणाएँ हुईं। अब आगे सरकारों का गठन होगा। सब सामान्य लगता है। राजनीतिक विश्लेषक अपने अपने विश्लेषणों में जुट गए।

परन्तु दिल्ली में कुछ अलग हुआ; कुछ विचित्र हुआ। इसे दो रूपों में देख सकते हैं। पहला तो एक नई राजनीतिक ताकत के रूप में केजरीवाल का उदय है। केजरीवाल का इसलिये कि अपने गठन और उसके बाद के काल में यह आन्दोलन जो पहले अन्ना की छाया में खड़ा हुआ था बाद में केजरीवाल की परछाईं के रूप में बड़ा हुआ है। ‘आप’ नाम की राजनीतिक पार्टी केजरीवाल की परछाईं ही है। यह केजरीवाल का ही निर्वैयक्तिक विस्तार है जिसमें कुछ अन्य चेहरे टाँके गए नजर आते हैं।

दिल्ली के चुनावों की दूसरी विस्मयकारी घटना है – भाजपा की विजय। मदन लाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा के वक्तों से लेकर दिल्ली भाजपा अपना कोई चेहरा ही नहीं बना पाई है। बल्कि पिछले कुछ समय से तो जिन चेहरों को दिल्ली भाजपा के सिंहासन पर बिठाया गया वे उसके सिर के ताज नहीं बन पाए सिर के बोझ जरूर बन गये थे। भाजपा को उन्हें खुद ही सिंहासन से दूर करना पड़ा। इस चुनाव 2013 में भी जनता ने उन चेहरों को नकार दिया। नतीजों में कहीं निचला क्रम ही उन चेहरों को मिल पाया।

जिन चेहरों को आगे करके इन चुनावों में दिल्ली भाजपा जनमत पाने को आई वे भी बहुत सकारात्मक नहीं थे। चमत्कारिक तो बिल्कुल नहीं थे जैसे कि केजरीवाल रहे और ‘आप’ नाम की राजनीतिक पार्टी के रूप में उनका निर्वैयक्तिक विस्तार रहा। तो फिर भाजपा दिल्ली में चुनाव जीती क्यों?

चुनाव के तत्काल बाद मैं कई लोगों से मिला और जाना की उन्होंने किसे मत दिया और क्यों दिया। अनेक मतदाताओं ने बताया कि उन्होंने भाजपा को वोट दिया है। परन्तु अनेक मतदाता तो अपने निर्वाचन क्षेत्र के भाजपा प्रत्याशी का नाम भी नहीं जानते थे। उन्होंने भाजपा को वोट दिया था। इन चुनावों से पहले दिल्ली भाजपा का कोई जनआन्दोलन तो याद नहीं आता है। तब इस भाजपा वोट का आधार क्या था?

इसका उत्तर है – नरेन्द्र मोदी। चुनाव पूर्व में भाजपा का एक ही आन्दोलन याद आता है – नरेन्द्र मोदी। शायद पूरे देश के मतदाता को नरेन्द्र मोदी के रूप में एक नायक मिला है। उसी नायक की परछाईं जब दिल्ली पर पड़ी तो वह दिल्ली की गद्दी बन कर अवतरित हुई। दिल्ली की गद्दी दिल्ली भाजपा की कमाई नहीं है बल्कि मोदी की परछाईं का मूर्तिमान रूप है। ठीक वैसे ही जैसे कि ‘आप’ नाम की राजनीतिक पार्टी की सीटें केजरीवाल की परछाईं का मूर्तिमान रूप है।

यह बिना चेहरे वाली दिल्ली भाजपा दिल्ली की गद्दी को प्राप्त को कर रही है पर इसका निर्वाह कैसे करेगी यह मूल प्रश्न है। अगर यह दिल्ली भाजपा जल्द ही एक सुन्दर जनग्राह्य रूप धारण नहीं करती है तो मोदी नामक जनआन्दोलन को नुकसान पहुँचा सकती है।

यह अमूर्त मुख भाजपा निकट भविष्य में दिल्ली में क्या करती है, कैसा रूप धरती है – इसकी प्रतीक्षा मोदी, केजरीवाल और दिल्ली के मतदाता सबको रहने वाली है।

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