HOMEOPATHY FOR HAIRFALL

HOMEOPATHY FOR HAIRFALL

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Alopecia means hair loss. Patients seeking homoeopathy for alopecia are increasing. The testimony of success to cure permanently is a rapid, gentle and permanent manner.

If alopecia is due to skin conditions like eczema, dermatitis and fungal infection, remedy is selected based on these. Along with indicated remedy mother tinctures enhancing hair growth, controlling dandruff, promoting blood supply through peripheral vessels, acting as hair tonic, etc. are usually recommended to use externally mixed with some oil for consistency.

ACIDUM FLOURICUM

Alopecia with great dryness of hair and soft nails. Falling out of hair after fevers. Children with a tendency to patchy bald areas, without a definite skin disease. But it is patchy areas of thinning of the hair rather than actual baldness.

ARSENICUM ALBUM

Falling of hair with convalescence. Sometimes from skin conditions like eczema, Urticaria, herpes zoster etc. with a characteristic thirst.

GRAPHITES

Hair of vertex, sides and beard turns grey early and falls out, with matted and brittle hair. Bald patches at the beard and chin.

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QUACKS, MEDICAL MAFIA AND THE GOVERNMENT

QUACKS, MEDICAL MAFIA AND THE GOVERNMENT

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  • There is an acute shortage of doctors in India.
  • Thousands of patients die because doctors were not available to them.
  • The government is going to allow semi-skilled doctors to provide medical care where the skilled ones are not available.
  • Those who see this profession as a minting occupation than an opportunity to serve have started raising hue and cry.
  • 45% of medical trade is occupied by very simple prescription e.g. pain killers, gastric problems, depression problems etc.
  • Specialized medical treatment share is only 8.7% of the complete medical trade.
  • As per views by a survey 87% consumers are not satisfied the way they were treated with by these so called Trained Medical Experts.

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सुनिये सरकार जी

सुनिये सरकार जी

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  • किसी विद्वान ने यह सलाह दी है कि इस देश में विवाह पूर्व डॉक्टरी परीक्षण आवश्यक कर दिया जाना चाहिये ताकि लड़का और लड़की को जाँच कर पता लगाया जा सके कि उन्हें कोई यौन समस्या तो नहीं है। तर्क दिया गया है बड़ी संख्या में शादियाँ केवल यौन-अक्षमताओं के चलते टूट जाती हैं इसलिये यदि शादी से पहले ही मेडीकल परीक्षण द्वारा यह सुनिश्चित किया जा सके कि दोनों पक्षों को यौन-अक्षमता नहीं है तो अनेक शादियों को टूटने से बचाया जा सकता है।
  • यह मान लेने के तार्किक आधार हैं कि सभी विवाहित लोगों की संख्या के मुकाबले इन विद्वान महाशय द्वारा देखे गये उन उदाहरणों की सँख्या बहुत ही कम होगी जिनके आधार पर यह नतीजा निकाला गया है। मुश्किल से एक प्रतिशत के सौंवे हिस्से से भी कम ही होगी। तो ऐसा क्या कारण हो गया था कि एक नगण्य सी संख्या को देखने भर से आपने सब लोगों के लिए एक अनिवार्य शर्त गढ़ने की बात तक सोच डाली।
  • दो तीन साल पहले तक पूरा घर 100-200 रुपये महीना पर केबल देख लेता था। अचानक कुछ विद्वानों को लगा कि इस विषय पर एक सामाजिक क्रांति की जा सकती है। उन्होंने ‘गरीबों का हित’, ‘आपके अधिकारों की सुरक्षा’, ‘चयन का अधिकार’ आदि शब्द बार बार कहे और उन शब्दों के नाम पर पता नहीं क्या-क्या किया गया कि आज उसी केबल को दस-बारह गुणा पैसा खर्च करके देखा जाने लगा। हजारों केबल वाले बेरोज़गार हो गये हैं। हाँ कुछ बड़े लोगों की जेबों में अब अधिक धन अधिक आसानी से पहुँचने लगा है। हम जनता को बताया दिया गया है कि हमारा भला हो गया है।
  • दिल्ली में एक बादशाह हुए हैं शाह आलम (1728-1826 ई)। उनके घटते हुए प्रभाव को लेकर उनके बारे में कहावत थी कि हुकूमत ए शाह आलम, अज़ दिल्ली ता पालम। तो क्या आज भी कुछ विद्वान लोग ऐसे हैं जो हुकूमत ए हिन्दुस्तान को सिर्फ पालम तक फैला हुआ मानते हैं।
  • ईस्वी सन् 2014 में भी दिल्ली से मात्र 106 किमी दूर ऐसे गाँवों को देखा जा सकता है जहाँ किसी क्वालीफाईड डॉक्टर से इलाज करवाने के लिए कम से कम 10 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है और वह भी किसी घोड़े ताँगे में या किसी जुगाड़ में बैठकर। जिसे बुखार की गोली मिलने में मुश्किल होती है उसे Sexual Fitness Certificate कैसे मिलेगा किसी ने यह बात विद्वान साहेब को क्यों नहीं समझाई?
  • ऐसा अंदेशा है कि जैसे ही यह साहेब वाला हुक्म लागू होगा तो तत्काल ही Sexual Fitness Certificate जारी करवाने वाले गिरोह विकसित हो जाएंगे जैसे कि प्रदूषण नियंत्रण वालों के यहाँ हो गये हैं। मोटी मोटी रकमें इधर से उधर होंगी सर्टिफ़िकेट्स जारी किये जाएंगे और भ्रष्टाचार का एक और चैनल शुरू हो जाएगा।

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शस्त्र उठाओ मोदी जी

शस्त्र उठाओ मोदी जी

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जब आपने चुनावों में वादा किया कि अच्छे दिन आने वाले हैं तो भारत की जनता ने मान लिया था कि यकीनन अब अच्छे दिन आने वाले हैं।

आपकी सरकार ने भी कदम उठाने शुरू कर दिये हैं। आप की तरफ़ से भी घोषणा कर दी गई है कि देश को कुछ कड़े कदमों के लिये तैयार रहना चाहिये। उम्मीद है कि अब टैक्स बढ़ा दिये जाएँगे, सब्सिडी कम कर दी जाएगी, पैट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिये जाएँगे, जनता हाहाकार करने लगेगी, पुलिस उन्हें दबाने के लिए इस्तेमाल की जाएगी और तब तक अगले चुनाव आ जाएँगे।

परन्तु यही सब तो पुरानी सरकारों के समय भी होता था। तब इसमें अलग क्या हुआ? क्या इसी तरह अच्छे दिनों को लाया जाने वाला है? इस से तो जनता में भयानक निराशा पैदा होगी।

पहला पत्र

  • आज भारतीय राष्ट्र-राज्य के सामने मुख्य चुनौती आर्थिक है। विदेशी कर्ज़ का सँकट है, उत्पादन घट गया है, काला धन घूसखोर नौकरशाहों, बिचौलियों और बिल्डरों की तिजोरियों में बँद है, जवाबदेही अपने न्यूनतम स्तर पर है, कानून-व्यवस्था का डर लगभग खत्म हो चुका है, पुलिस बेलगाम हो उठी है, न्याय का वितरण मनमाने तरीके से हो रहा है ।
  • इस दुष्चक्र से निकलने के लिए पहला और सबसे जरूरी विकल्प उत्पादन को बढ़ाना है। इसके लिए करों Taxes को ना बढ़ाया जाए। लोगों से श्रमदान यानी कि श्रम का दान करवाया जाए।
  • जो जहाँ है वहीं से देश-प्रहरी बन कर कर्म में जुट जाए। काम के घंटे बढ़ाए, काम की गुणवत्ता बढ़ाए, काम का दायरा बढ़ाए। उत्पादन प्रति व्यक्ति बढ़ाए। जनता का पैसा नहीं छीना गया बल्कि जनता ने स्वतः ही श्रम का योगदान दिया।
  • जिनके पास काम नहीं है उनके लिये काम सृजित किया जाए। सरकार के लुटेरे विभागों जैसे – एक्साईज़, आयकर, प्रोविडैन्ट फँड, श्रम, ईएसआईसी(ESIC) जैसे उत्पीड़क विभागों पर लगाम कसी जानी चाहिए। इन विभागों के बाबू और अफ़सर मिलकर कर उगाही और जनता के कल्याण के नाम पर देश के उद्योगों को चौपट कर रहे हैं।
  • सन् 2014 के मूल्यों के आधार पर 200 करोड़ रुपये से कम टर्न-ओवर वाले उद्योगों को इन विभागों से पूरी छूट दी जाए और 1000 करोड़ रुपये तक के टर्न-ओवर वाले उद्योगों के लिए इन विभागों से बहुत सरल नियम बनाए जाने चाहियें।
  • सन् 2014 के मूल्यों के आधार पर पाँच व्यक्तियों के एक सामान्य परिवार को अपने लिये गरिमामय जीवन यापन के लिए कम से कम पचास हजार रुपये हर महीने चाहिए। अतः छः लाख तक की वार्षिक आय पर किसी प्रकार का कर नहीं लगाया जाना चाहिये। इससे अधिक की आय पर भी कराधान अत्यँत स्नेहिल ही होना चाहिये।
  • सवाल है कि तब इन सब कामों को करने के लिए धन कहाँ से आएगा।
  • अब सन् 1970-75 के वे दिन नहीं हैं जब गरीबों के उत्थान के लिए धनवानों को गाली देना जरूरी था। आज धनवानों को गरियाने से कुछ हासिलनहीं होगा। धनवान इसी भारतीय समाज के हिस्से हैं वो हमारे ही हैं।
  • वो भी विकास को वैसे ही चाहते हैं जैसे समाज के दूसरे वर्ग चाहते हैं। आज समय उनसे बैर करने का नहीं उनसे सहारा लेने का है। आज आपको नया नारा देना होगा जिससे धन और धनवान दोनों आगे आएँ। नए भारत के निर्माण के लिये।
  • एक ऐसे कोष की स्थापना की जा सकती है जहाँ जमाकर्ता से उसके स्रोत पर प्रश्न ना किये जाएँ। स्विस बैंको की तर्ज़ पर कोई भी व्यक्ति कितनी भी रकम जमा करवाए। कोई भी बँदिश ना लगाई जाए।
  • ऐसे जमाकर्ताओं से इस सेवा के बदले कुछ बहुत मामूली सा शुल्क लिया जा सकता है। उनसे कहा जा सकता है कि वे अपनी रकम को एक न्यूनतम अवधि जैसे कि एक या दो साल तक ना निकालें।
  • एक छोटी सी सावधानी यह भी रखनी होगी कि यह धन निकासी के बाद सीधा ही भारतीय बाजार में ना उतारा जा सके। इससे महँगाई बढ़ सकती है। इसका भुगतान किसी दूसरे रूप में जैसे सोने के माध्यम से या हार्ड कैश के रूप में किया जा सकता है।
  • कुल निष्कर्ष वही है जो आपने नारा दिया था – मिनिमम गवर्न्मैन्ट एण्ड मैक्सिमम गवर्नैंस।

अब आप अपने शस्त्र उठा ही लीजियेमोदी जी! राष्ट्र निर्माण का युद्ध शुरू हो चुका है;

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कालाधन सिर्फ काला नहीं होता

कालाधन सिर्फ काला नहीं होता

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जो भी धन स्थापित व्यवस्थाओं के उल्लंघन से हासिल किया जाता है वही काला धन होता है। सरल शब्दों में कहें तो बिना टैक्स चुकाए जो धन सरकार से छिपाया जाता है वह काला धन होता है।

जब सरकार की नीतियाँ अस्थिर, शोषणकारी और दमनपूर्ण होंगी और उसके साधन हर स्थान पर उपलब्ध नहीं होंगे तो जनता का सक्षम वर्गभविष्य की सुरक्षा के लिए अपनी आय को छुपा लेता है और काले धन का निर्माण करता है। ऐसा भी संभव है कि आय उन साधनों से हुई हो जिन्हें सरकार ने प्रतिबंधित किया हुआ है। जैसेकि प्रतिबंधित वस्तुओं की बिक्री करके या घूस आदि लेकर।

काले धन के कई प्रकार हैं।

  • आम लोगों का काला धन
  • उद्योगपतियों का काला धन
  • राजनेताओं का काला धन
  • ब्यूरोक्रेट्स का काला धन
  1. आम लोग अपनी घोषित कमाई के अलावा भी एकाध काम जैसे – सुबह अखबार बेचकर, लिफाफे बना कर, छोटी मोटी मशीनें लगा कर, कोई टॉफी-बिस्कुट की दुकान खोलकर आदि करके कुछ कमाई कर लेते हैं और सरकार से छुपा लेते हैं। इस धन का मुख्य उद्देशय अपने सामाजिक भविष्य को सुरक्षित करना होता है। आकार में यह कालाधन इतना सूक्ष्म है कि सरकारें इस पर आमतौर से विचार भी नहीं करतीं।
  2. उद्योगपति अपने उद्योगों से होने वाली कमाई का पूरा ब्यौरा ना देकर कुछ काला धन कमाते हैं। कई बार इसका आकार बहुत बड़ा भी हो सकता है। उद्योगपति को इस कालेधन की जरूरत सरकारी बाबूओं, अधिकारियों और मजदूर नेताओं आदि की जरूरतें पूरी करने के लिये होती है।
    1. किसी उद्योगपति के पास कुछ काला होता है तो वह उसका इस्तेमाल नया उद्योग खड़ा करने में करता है जिससे अधिक उत्पादन और रोजगार पैद होता है। भारत जैसी अधकचरी अर्थव्यवस्थाओं में यदि ऐसे काले धन को समाप्त किया गया तो यह उद्योगों के लिये ही विनाशकारी होगा। उद्योग तबाह हो जाएँगे। इस काले धन को समाप्त नहीं किया जा सकता।
  3. कालेधन का एक अन्य प्रकार राजनेता के पास होता है। कई राजनेताओं को राजनीति में बचे रहने के लिए अनेक ऐसे जनकल्याणकारी कार्य करने होते हैं जिनके लिए सरकार से कोई धन प्राप्त नहीं होता। बाहरी दिल्ली का एक प्रसिद्ध युवा नेता अपने व्यक्तिगत पैसे से एक हजार के लगभग वृद्धाओं को मासिक पेंशन देता है।
    1. राजनेताओं का कालाधन एक बुरे काम के लिए भी इस्तेमाल होता है। यह राजनीतिक अस्थिरता और कानूनी अराजकता के लिए भी प्रयोग किया जाता है। उस अवस्था में यह देश-समाज के लिए नुकसानदेह होता है।
    2. राजनेताओं के काले धन के बहुमुखी इस्तेमाल की संभावनाओं के मद्देनज़र इसे पूरी तरह नष्ट करने की सोचना उचित नहीं होगा। राजनेताओं के कालेधन को नष्ट करने की बजाय इसे रेगुलेट करने की सोचनी चाहिए। इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए।
  4. सबसे बुरा कालाधन ब्यूरोक्रेट्स का कालाधन होता है। यह धन आम आदमी के शोषण से पैदा होता है। ब्यूरोक्रेट्स का काला धन आम जनता की परचेजिंग पावर को घटा कर पैदा किया जाता है अतः यह बाजार के खिलाफ काम करता है। दूसरा यह उत्पादन को बढ़ाए विना ही बाजार में (काला)धन झोंक देता है अतः महँगाई को बढ़ाता है। यह ही वह कालाधन है जो स्विस बैंकों की पासबुकों के पृष्ठ सँख्याओं को बढ़ाता है। यही वह कालाधन है जिसको बढ़ाने के लिए बाबू और अधिकारी मिलकर आम जनता के कामों को रोकते हैं और कानूनों की अबूझ पेचीदगियाँ पैदा करते हैं। यह ही वह धन जिसकी मात्रा अकूत होती है। आम आदमी इसी काले धन से त्रस्त होता है। इसी पर लगाम लगाए जाने की जरूरत है।

कालेधन की समस्या पर काम करने के लिए सरकार को अपनी सोच स्पष्ट करनी होगी- कौन सा कालाधन? वह क्यों पैदा होता है? उसे पैदा करने में वर्तमान व्यवस्था के कौन से तत्त्व जिम्मेदार हैं? पूरी व्यवस्था में कौन से सुधार दरकार हैं जिनके बाद कालेधन की जरूरत ही ना रहे? इन सभी आधारों पर सोचकर ही कालेधन पर कुछ युक्तिसँगत कहा जा सकेगा।

इसी दिशा में एक सुझाव यह भी है जितना संभव हो कालाधन अनुमोदित, नियंत्रित या प्रतिवंधित किया जाए और शेष कालाधन जिस पर किसी भी प्रकार का कानूनी आचरण संभव नहीं है उसका राजनीतिक-सामाजिक उपयोग किया जाए। एक ऐसे कोष की संभावना पर विचार किया जा सकता है जो लगभग स्विस बैंको की तर्ज पर हो और जिसमें जमा करवाए गये धन के स्रोत के विषय में कभी भी ना पूछे जाने की गारँटी दी जाए। ऐसे अज्ञात-स्रोत वाले धन के स्वामियों को ब्याज ना दिया जाए बल्कि एक बहुत मामूली सी राशि उनके धन को हिफ़ाजत के साथ सुरक्षित रखनें के लिए उनसे ही ले ली जाए। बस सरकारी नियँत्रण इतना ही हो कि ऐसे जमाकर्ता एक निश्चित समय जैसे एक या दो वर्ष तक उस रकम को खाते में बनाए रखने का वचन दें ताकि सरकार के पास उस धन का एक निरंतर प्रवाह और निवेश बना रहे।

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समुद्र मंथन की समाप्ति और एक बिलखता हुआ योद्धा

समुद्र मंथन की समाप्ति और एक बिलखता हुआ योद्धा

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भारतीय चुनावी समुद्रमंथन अब पुरा हो चुका है। भिन्न भिन्न देव-अदेव अपने अपने हिस्से के ऐरावत, कामधेनु, कल्पतरु और हलाहल पा चुके हैं। इच्छुक लोग अमृत-वितरण के लिए लाईन में बैठ चुके हैं। कमोबेश शांति सी ही लग रही है कि कहीं दूर से कोई कैटभ जैसी चीत्कार सुनाई पड़ती है। आओ देखें कि क्या हुआ?

आजकल एक कलाबाजी श्रीमान् निरन्तर आग्रहशील नेता जी और उनके सखा करते नजर आ रहे हैं। ये लोग अनवरत् आन्दोलनकारी हैं। सामान्य जीवन भी इनके लिए एक आन्दोलन ही है। चुनाव निकट देखकर इनके भीतर का आन्दोलन फिर जाग उठा है। जनता ने इन्हें जिस बुरी तरह से नापसंद किया है ये उससे भी कोई सबक नहीं लेना चाहते हैं। अब इन लोगों ने बलात् प्रसिद्धि के लिए कोर्ट-कचहरी को भी अपना अखाड़ा बना लिया है। जब आप बनारस में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये गए थे तो भी एक लेख इसी मंच से लिखा गया था । आज चुनाव बाद वह लेख अपने सत्य के साथ आपके सामने खड़ा है।

हर आरोपी को अपनी उपस्थिति की जमानत देनी होती है। इसके लिए एक फॉर्म जिसे मुचलका या पर्सनल बॉन्ड कहते हैं उस पर साईन करने होते हैं। इसके लिए कोई नकद पैसा नहीं देना पड़ता। और यह कानून के द्वारा स्थापित एक प्रक्रिया है। सभी नागरिक इसका पालन करते हैं। क्योंकि कोई भी व्यक्ति कानून से बड़ा नहीं हो सकता तो सभी इस प्रक्रिया को समान रूप से मानते चले आ रहे हैं। श्रीमान केजरीवाल का कहना है कि वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि उनका उसूल ऐसा करने के खिलाफ़ है। लोग पूछ रहे हैं कि केजरीवाल जी देश कानूनों से चलेगा या आपके खुद के उसूलों से चलेगा। वे उसूल जो आपकी सुविधा के मुताबिक कभी भी बिना पूर्व चेतावनी के बदल जाते हैं और कोई भी ऐसा नया रूप धर लेते हैं जिससे आपको अपना फ़ायदा होता है।

आजकल का समय राजनीति में प्रपंच करने का नहीं रह गया है। जनता परफॉर्मैंस चाहती है। परफॉर्मैंस के नाम पर धरने, भीड़, सड़क जाम और बेकार की नौटंकियाँ आजकल जनता को आकर्षित नहीं करती हैं। इसलिए ये कैलकुलेट अब आपको करना है कि बाकी का समय आप नए प्रपंचों को अविष्कृत करने में लगाएँगे या जनता की सेवार्थ कुछ सच्चे काम कर के दिखाएँगे।

सँभलने के लिये समय बहुत ज्यादा नहीं बचा हुआ है।

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काशी अश्वमेध यज्ञ और बलि का अश्व

काशी अश्वमेध यज्ञ और बलि का अश्व

Arvind3राजनीतिक पण्डित कहते हैं कि चुनाव 2014 के रूप में काशी में एक अन्य अश्वमेध यज्ञ आयोजित किया जा रहा है। अपनी राज्य पताका फहराने के बाद मोदी नामक सम्राट यहाँ अश्वमेध यज्ञ कर रहा है। सम्राट को अपने यज्ञ के लिए एक अश्व की जरूरत थी तो कुछ लोगों ने जबरदस्ती उस आदमी को भेज दिया जो स्वयँ अपने हाथ में सम्राटत्व की पर्ची उठाए घूम रहा था। वह आदमी वैकल्पिक सम्राट होने का दम भरता था पर हालात ने उसे यज्ञ बलि की वेदी पर पहुँचा दिया।

यह सब कैसे हुआ?

यह सब किसने किया?

आओ देखते हैं . . .

 दिल्ली चुनावों की अप्रत्याशित सफलता ने AAP के लोगों के दिमागों में हवा भर दी। उस सफलता को वे लोग संभाल नहीं पाए और ऊटपटाँग काम करने लगे। उन्होंने दिल्ली में तोड़फोड़ करके अपनी सरकार गिराई और भारत का राजपाट सँभालने के लिये लोकसभा की ओर चल पड़े।

इन लोगों ने करनाल में रैली की। रैली तो खैर क्या थी पाँच सात सौ लोगों की सभा थी। वहाँ ये सब AAP वाले जोश में भर उठे और इनमें से जो सज्जन अति स्वस्थ प्रकृति वाले हैं पहलवानी आचरण जिन्हें भाता है और जोश बहुत आता है उन्होंने AAP के धनुर्धर इन चीफ श्रीमान केजरीवाल के विषय में घोषणा कर दी कि यदि मोदी वाराणसी से चुनाव लड़ते हैं तो केजरीवाल जी भी वहीं से चुनाव लड़ेंगे।

उनके पूरे राजनीतिक जीवन में शायद यह पहली पारी होगी जिसमें उनकी पराजय पहले से ही सुनिश्चित है। कल बैंगलोर में बोलते हुए उन्होंने कहा भी है कि जब मैं दोबारा दिल्ली का मुख्यमंत्री बनूँगा तो बीच में रह गए कामों को पूरा करूँगा। यानी कि उन्हें पता है कि बनारस से हारकर ही दिल्ली वापिस जाना है।

बनारस की हार के बाद क्या केजरी अपनी खोई हुई श्रीप्रतिष्ठा को वापिस ले पाएँगे? बनारस से हारकर लौटा हुआ आदमी क्या दिल्ली की जनता के सामने अपनी पूर्ववर्ती छवि बना पाएगा? क्या एक हतप्रभ AAP नेता दिल्ली की जनता का विश्वास जीत पाएगा? यदि नहीं तो यह स्पष्ट होना चाहिये के बनारस के इस कुएँ में केजरी ने खुद छलाँग लगाई है या किसी ने पीछे से धक्का दिया है

क्या AAP में कुछ ऐसे लोग आ गये हैं जो केजरी को दिल्ली के मुख्यमंत्रित्व से दूर रखना चाहते हैं? इसी लिये उन्हें एक ऐसी रणभूमि में भेज दिया गया है कि जहाँ वो ना तो जीतने के पराक्रम को दिखा पाएँगे और ना ही उन्हें हारने वाली वीरगति ही प्राप्त हो पाएगी।

तो क्या इतना बड़ा अघोर कर्म करने वाला पण्डित केजरीवाल अब राजनीतिक प्रेतयोनि में जीते रहने को अभिशप्त होगा? या फिर दिल्ली साम्राज्य की सम्पूर्ण अखण्डता का यह मोदी यज्ञ किसी केजरी नामक अश्व की बलि के साथ समपन्नता को प्राप्त होगा? क्या AAP के लोगों ने केजरीवाल के गले में बलि पर चढ़ने से पूर्व खुद ही पुष्पमाल डाल दी है?

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